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एकात्म मानववाद के प्रवर्तक पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी

प्रो. सूर्य प्रकाश सेमवाल : समाज और राष्ट्र के लिए अपना सम्पूर्ण जीवन आहूत करने वाले व्रती स्वयंसेवक, कुशल अर्थचिन्तक, अद्वितीय संगठन शिल्पी, आदर्श राजनेता और विख्यात पत्रकार पं. दीनदयाल उपाध्याय से कौन परिचित नहीं होगा, दीनदयाल जी का एकात्म मानववाद 77 वर्ष पूर्व भी उपयोगी और प्रासंगिक था और आज भी उतना ही सार्थक और अनुकरणीय है।

पंडित दीनदयाल उपाध्याय का जन्म 25 सितंबर 1916 को उत्तर प्रदेश के मथुरा जिले के नंगला चंद्रभान गांव में एक सामान्य परिवार में हुआ था। पिता भगवतीप्रसाद उपाध्याय और माँ श्रीमती रामप्यारी अपने दुलारे को दीना कहकर पुकारते थे, यही दीना आगे चलकर बहुवस्तुस्पर्शिनी प्रतिभा और विराट व्यक्तितव के धनी राष्ट्र पुरुष सिद्ध हुए।

नियति ने दीना को अल्पायु में ही माता-पिता के स्नेह और वात्सल्य से वंचित कर दिया। मात्र तीन वर्ष की आयु में पिता दुनिया छोडकर चले गए और 4 वर्ष पश्चात माँ भी स्वर्ग सिधार गईं। अनाथ दीना का लालन-पालन नाना महाशय चुन्नीलाल जी ने किया, लेकिन जब दीना की आयु मात्र 11 वर्ष थी तो नाना भी इस दुनिया से चले गए और एक अनाथ किशोर जीवन की प्रतिकूल स्थितियों  और कठिनाइयों से संघर्ष करने के लिए अकेला छूट गया।

इसके बाद दीना की देखरेख और शिक्षा की जिम्मेदारी मामा राधारमण जी ने ली। दीना बचपन से ही प्रतिभावान छात्र था, मैट्रिक परीक्षा में अजमेर बोर्ड से प्रथम स्थान प्राप्त करने पर सीकर के महाराजा कल्याण सिंह ने दीना को स्वर्णपदक के साथ 250 रूपए का नकद पुरस्कार और 10 रूपए प्रतिमाह की छात्रवृति दी।

इन्टरमीडिएट में भी दीना को बिड़ला कॉलेज में प्रथम स्थान मिला तो सुप्रसिद्ध उद्योगपति घनश्याम दास बिडला ने नकद सम्मान के साथ छात्रवृति भी प्रदान की। बिड़ला जी ने दीनदयाल जी को अपने संस्थान में नौकरी का प्रस्ताव भी दिया।

कानपुर के सनातन धर्म कॉलेज में दीनदयाल जी ने स्नातक कक्षा में प्रवेश लिया|यहां कॉलेज छात्रावास में उनका संपर्क राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवकों-सुंदर सिंह भण्डारी और बलवंत महासिंघे से हुआ। संघ शाखा से जुड़ने के बाद दीनदयाल जी को कानपुर में भाऊराव देवरस जी का सान्निध्य प्राप्त हुआ।  

संघ संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार से भेंट के बाद दीनदयाल जी के मन में “इदं राष्ट्राय इदं न मम्” का मन्त्र और मन्त्रद्रष्टा संघ पूरी तरह से रच बस चुका था। डॉ. हेडगेवार पर मराठी में लिखी 500 पृष्ठ की कृति का हिंदी में अनुवाद कर दीनदयाल जी ने स्वयंसेवकों के लिए राष्ट्र सेवा का ज्ञानकोष तैयार किया।

घनश्याम दास बिड़ला के नौकरी के प्रस्ताव को विनम्रता से अस्वीकार करने के बाद प्रशासनिक सेवा में भी चयन हुआ किन्तु दीनदयाल जी ने तो समाज और राष्ट्र के लिए अपने जीवन को खपाने का दृढ संकल्प कर लिया था, इस प्रकार उन्होने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के माध्यम से एक व्रती स्वयंसेवक और संकल्पित संघ प्रचारक बनकर अपना जीवन देश को समर्पित करने का निश्चय कर लिया।

संघ कार्य में विद्यार्थी जीवन से ही समर्पित भाव से संलग्न हुए और वर्ष 1937 में संघ शिक्षा प्रथम वर्ष और 1942 में द्वितीय वर्ष का प्रशिक्षण प्राप्त करने के बाद  दीनदयाल जी को लखीमपुर जिले के संघ प्रचारक का दायित्व मिला। 1945 में दीनदयाल जी उत्तर प्रदेश के सह प्रांत प्रचारक बने और वहां से उन्होंने अपने उर्जावान स्वयंसेवकों के साथ राष्ट्रधर्म और पाञ्चजन्य का प्रकाशन प्रारम्भ किया।

सम्पादन और प्रबन्धन में कौशल प्राप्त दीनदयाल जी एक स्थापित लेखक और रचनाकार भी थे, उन्होंने देश की संस्कृति, इतिहास, आर्थिकी और समाज जागरण विषयक अनेक रचनाएं लिखीं इन पुस्तकों में -‘सम्राट चन्द्रगुप्त‘, ‘जगद्गुरु शंकराचार्य‘, ‘अखंड भारत क्यों’, ‘भारतीय अर्थनीति की दिशा’, राष्ट्रजीवन की समस्याएं, एकात्म मानववाद, लोकमान्य तिलक की राजनीति, जनसंघ सिद्धांत और नीति, हमारा कश्मीर, भारतीय राष्ट्रीय धारा का पुनः प्रवाह, भारतीय संविधान पर एक दृष्टि आदि प्रमुख रचनाएँ हैं, जो संस्कृति, परंपरा, शिक्षा, इतिहास, अर्थशास्त्र और राजनीति सभी क्षेत्रों का स्पर्श करती हैं|

इसी कालखंड में जवाहरलाल नेहरू मंत्रिमंडल में उद्योग मंत्री डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी प्रधानमन्त्री की तुष्टिकरण नीति से अत्यंत आहत थे। डॉ. मुखर्जी ने 1950 में लियाकत अली समझौते के विरोध में मंत्री पद से त्यागपत्र दे दिया।

डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी कांग्रेस के विरुद्ध एक सशक्त अखिल भारतीय राष्ट्रवादी संगठन बनाना चाहते थे ,जब उन्होंने श्रीगुरूजी के समक्ष यह विषय रखा तो इस प्रस्ताव को स्वीकृति देने के साथ श्रीगुरूजी ने डॉ.मुखर्जी को उत्तर प्रदेश से पं. दीनदयाल उपाध्याय और नानाजी देशमुख जैसे दो समर्पित और योग्य कार्यकर्ता दे दिए।

21 अक्टूबर 1951 को डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के नेतृत्व में भारतीय जनसंघ की स्थापना हुई और पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी को जनसंघ का प्रथम राष्ट्रीय महामंत्री नियुक्त किया गया। 1953 से 1967 तक दीनदयाल जी ने महामंत्री के रूप में भारतीय जनसंघ को एक विशाल वटवृक्ष तक पहुँचाने का कार्य किया।

दिसंबर 1967 में पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी भारतीय जनसंघ के अध्यक्ष चुने गए। उन्होंने हमेशा स्वयं पीछे रहकर काम किया, वे कभी संसद सदस्य नहीं बने, लेकिन वे अनेक सुयोग्य संसद सदस्यों के निर्माता थे- और उस वैचारिक अधिष्ठान की भी धुरी।

पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी के विषय में उनके सहयात्री डॉ. श्यामा प्रसाद  मुखर्जी का कहना था कि- “यदि मुझे दो दीनदयाल और मिल जाएं तो मैं देश के मानचित्र को बदल दूंगा। ” 

दीनदयाल जी की इहलोक यात्रा भी रहस्यमय ढंग से पूर्ण हुई। 11 फरवरी 1968 की रात्रि में दीनदयाल जी रेलगाड़ी से लखनऊ से पटना के लिए रवाना हुए थे,दूसरे दिन मुगलसराय स्टेशन पर उनका शव मिला। यह मृत्यु एक पहेली थी और प्रश्न आज तक अनुत्तरित है। दीनदयाल जी का असामयिक निधन समूचे देश के लिए कभी न भुलाने वाला शोक और एक अपूरणीय क्षति है।