धर्म-संस्कृति
चारधाम यात्रा: परंपरा, प्रकृति और आत्मिकता का संगम
राष्ट्रोक्ति वेब डेस्क :
"गंगोत्री यमुनोत्री च केदारं बदरी तथा। एते चारि स्थलान्याहु: स्वर्गस्य द्वारपथं ध्रुवम्॥
चार धाम यात्रा ? (Char Dham Yatra in Uttarakhand?)
हिमालय की ऊँचाइयों में बसे उत्तराखंड के चार धाम — यमुनोत्री, गंगोत्री, केदारनाथ और बद्रीनाथ — भारत की धार्मिक चेतना, सांस्कृतिक विरासत और आध्यात्मिक परंपराओं के अमूल्य रत्न हैं। इन तीर्थ स्थलों को केवल एक धार्मिक यात्रा के रूप में देखना इस अनुभव की गहराई को कम आंकना होगा। यह यात्रा है — देवत्व की खोज से आत्मा की ओर लौटने की।
चारधाम का ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व (Historical & Spiritual Importance)
चारधाम यात्रा का उल्लेख हमें कई पुराणों में मिलता है। यह माना जाता है कि इन तीर्थों की यात्रा मानव को पापों से मुक्त कर मोक्ष की ओर अग्रसर करती है। ये स्थल केवल पूजा के केन्द्र नहीं, बल्कि भारतीय वास्तुकला, सं...
श्री गंगोत्री धाम एवं श्री यमुनोत्री धाम के कपाट खुलने के साथ ही चारधाम यात्रा-2025 शुरू
राष्ट्रोक्ति वेब डेस्क : अक्षय तृतीया के दिन श्री गंगोत्री धाम एवं श्री यमुनोत्री धाम के कपाट खुलने के साथ ही उत्तराखंड की विश्व प्रसिद्ध चारधाम यात्रा-2025 का शुभारंभ हो गया है। कपाट खुलने के अवसर पर प्रदेश के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने पवित्र गंगोत्री धाम में पूजा-अर्चना की। बाद में उन्होंने श्री यमुनोत्री धाम में यमुनोत्री मंदिर में आरती भी की।
पुष्कर सिंह धामी ने मीडिया से कहा कि आज से चार धाम यात्रा का शुभारंभ हो गया है। गंगोत्री, यमुनोत्री के कपाट आज खुल गए हैं। यह यात्रा एक उत्सव की तरह है। सभी तैयारियां पूरी हो गई हैं। हम चाहते हैं कि यात्रा सुरक्षित, सुगम और बिना किसी परेशानी के हो।
“मैं चारधाम यात्रा पर आने वाले सभी तीर्थयात्रियों का स्वागत है। हमारा प्रयास है कि तीर्थयात्रियों को कोई परेशानी न हो, उनकी यात्रा सुगम हो, सुरक्षित हो। हम लगातार निगरानी कर रहे हैं। यह ...
प्रयागराज महाकुम्भ : संस्कार भारती ने ‘राष्ट्र रत्ना’ शोभायात्रा के माध्यम से वीरांगनाओं का किया स्मरण
प्रयागराज। हम भारतवासी अपने स्वाधीनता की शताब्दी वर्ष की ओर अग्रसर हैं। देश के नव निर्माण में योगदान देने वाली आदर्श मातृ शक्ति और वीरांगनाओं की अनगिनत गाथाएं अनुकरणीय हैं। उन वीरांगनाओं के उत्सर्ग और समर्पण को स्मरण करने हेतु संस्कार भारती की ओर से प्रयागराज महाकुम्भ 2025 के दौरान ‘राष्ट्र रत्ना’ शोभायात्रा का आयोजन किया गया।22 जनवरी, 2025 को यह शोभा यात्रा सेक्टर 10 स्थित संस्कार भारती शिविर-महेश्वर से गंगा जी के तट तक संपन्न हुई। शोभायात्रा में भारत के राष्ट्रीय, समाजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक व आध्यात्मिक क्षेत्रों में अपने शौर्य का, मेधा का और जीवट का प्रदर्शन करने वाली नारी शक्ति को पुनर्जागरण का संदेश देने वाली योगदात्रियां, जैसे-रानी दुर्गावती, लोकमाता अहिल्याबाई होलकर, सावित्री बाई फुले, रानी चेनम्मा आदि को स्मरण महत्वपूर्ण है।
हमारा देश मीराबाई की 525वीं जयंती मना रहा है। चं...
छठ महापर्व का पौराणिक आधार और मान्यता !
अमित दुबे
जब हमने लोक आस्था के पर्व छठ पर लोगों के विचार एकत्रित करना शुरू किया, तो एक रोचक प्रश्न से सामना हुआ। प्रश्न यह कि छठ पूजा बिहार में ही क्यों? इस प्रश्न ने पर्व के उद्गम व इसकी विकास यात्रा के बारे में जानने की प्रेरणा दी। इससे सम्बंधित कई प्राचीन कथाएं भी हैं। लेकिन, सबसे अधिक प्रामाणिक लगा सूर्य विज्ञान की भारतीय परम्परा से जुड़ाव। दरअसल, सूर्य विज्ञान का प्राचीन केंद्र बिहार ही था। अपनी क्षमता के अनुसार प्रश्न का उत्तर ढूंढने के क्रम में बिहार राष्ट्रभाषा परिषद द्वारा प्रकाशित हस्तलिखित पोथियों के विस्तृत विवरणी ने हमारी सहायता की. उस विवरणी ने जो सूत्र दिया उसके आधार पर हमने जो पाया वह इस प्रकार है-
सूर्य विज्ञान के पर्व छठ का दस्तावेजी संदर्भराष्ट्रभाषा परिषद के अधिकारी के तौर पर शिवपूजन सहाय ने पं. रामनारायण शास्त्री को बिहार के विभिन्न क्षेत्रों में उपलब्ध हस्तलिखित ...
1 अक्टूबर से शुरू होंगे कैलाश दर्शन, ओल्ड लिपुलेख दरें पर बनाए गए व्यू पॉइंट से हो सकेंगे दर्शन
कैलाश पर्वत के दर्शन 1 अक्टूबर से शुरू होंगे, जिसमें 22 से 55 साल के श्रद्धालुओं को ही अनुमति होगी। यात्रा चार दिनों की होगी, जिसमें पिथौरागढ़ से गुंजी गांव, आदि कैलाश और ओम पर्वत के दर्शन शामिल हैं। प्रति व्यक्ति किराया 80,000 रुपये है
Kailash Parvat Yatra : भारत से ही कैलाश पर्वत के दर्शन का इंतजार कर रहे श्रद्धालुओं के लिए बड़ी खबर है। हिंदुओं के लिए अत्यधिक पवित्र माने जाने वाले कैलाश पर्वत के दर्शन की यात्रा 1 अक्टूबर 2023 से शुरू होने जा रही है। इस यात्रा की घोषणा कुमाऊं मंडल विकास निगम (केएमवीएन) ने की है। श्रद्धालुओं को पिथौरागढ़ जिले में स्थित ओल्ड लिपुलेख दरें पर बनाए गए व्यू पॉइंट से कैलाश पर्वत के अद्भुत नजारे का अनुभव कराया जाएगा।
उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले के ओल्ड लिपुलेख की पहाड़ियों से MI-17 हेलिकॉप्टर से अगले हफ्ते से कैलाश पर्वत के दर्शन शुरू हो जाएंगे। इस यात्रा ...
श्राद्ध और पितृपक्ष का वैज्ञानिक महत्व
लेखक - डॉ. ओउम् प्रकाश पाण्डेय
पितर का अर्थ होता है पालन या रक्षण करने वाला। पितर शब्द "पा रक्षणे" धातु से बना है। इसका अर्थ होता है पालन और रक्षण करने वाला। एकवचन में इसका प्रयोग करने से इसका अर्थ जन्म देने वाला पिता होता है और बहुवचन में प्रयोग करने से पितर यानी सभी पूर्वज होता है। इसलिए पितर पक्ष का अर्थ यही है कि हम सभी सातों पितरों का स्मरण करें। इसलिए इसमें सात पिंडों की व्यवस्था की जाती है, जिन्हें सप्तपिंडीं या सपिंडीं कहा जाता है। इन पिंडों को बाद में मिला दिया जाता है। ये पिंड भी पितरों की वृद्धावस्था के अनुसार क्रमश: घटते आकार में बनाए जाते थे। लेकिन आज इस पर ध्यान नहीं दिया जाता।
राष्ट्रोक्ति वेब डेस्क : श्राद्ध कर्म श्रद्धा का विषय है। यह पितरों के प्रति हमारी श्रद्धा प्रकट करने का माध्यम है। श्राद्ध आत्मा के गमन जिसे संस्कृत में "प्रयन्ति" कहते हैं, से जुड़ा हुआ है। प...
सनातन परंपरा से मेल खाते हैं जनजाति समाज के पर्व-त्योहार एवं पूजा-पद्धति
राष्ट्रोक्ति वेब डेस्क : अखिल भारतीय वनवासी कल्याण आश्रम के समालखा (हरियाणा) में आयोजित कार्यकर्ता सम्मेलन के तीसरे दिन 22 सितंबर को प्रथम सत्र का शुभारंभ अरुणाचल प्रदेश की स्थानीय भाषा में प्रार्थना से हुआ। जिसका भावार्थ यही था कि सबका कल्याण हो।
जनजाति समाज विशाल सनातन समाज का आधार स्तंभ
प्रथम सत्र में वनवासी कल्याण आश्रम के राष्ट्रीय अध्यक्ष सत्येंद्र सिंह ने कहा कि जनजाति समाज विशाल सनातनी समाज का आधार स्तंभ है। हम सभी का जड़-नाल वनों में ही गड़ा हुआ है। प्राचीन वेदों की रचना में वनवासी समाज का भी अहम योगदान रहा है। सभी जनजाति समाज के पर्व-त्यौहार एवं पूजा पद्धति सनातनी परंपरा से मिलते हैं, जिसका भाव एक ही है। अलग करने का षड्यंत्र अंग्रेजों की देन है, जिन्होंने इतिहास को तोड़-मरोड़ कर पुस्तकों के माध्यम से रचा।
जनजाति समाज संग्रही प्रवृत्ति का नहीं होता, वह प्रकृति से उतना ही...

