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कालजयी रचनाकार और उपन्यास सम्राट प्रेमचन्द!

हेमचन्द्र सकलानी

‘‘जब भी कभी कहीं कहानियों का जिक्र आयेगा
सबसे पहले, प्रेमचन्द को याद किया जायेगा।’’
इसमें किसी को भी संदेह नहीं है, कि जब भी कभी साहित्य की चर्चाओं में, कहानियों के बारे में कभी कुछ बोला जायेगा, लिखा जायेगा या कहानियों की चर्चा होगी, वहां प्रेमचन्द या उनकी कहानियां के उद्धरण के बिना सब कुछ अधूरा सा लगेगा। 31 जुलाई 1880 को बनारस के लमहीं गांव के एक बहुत ही साधारण परिवार में अजायब राय जो डाकखाने में मामुली से मुंशी थे, के घर प्रेमचन्द का जन्म हुआ था। बेहद सम्पन्न न होने के बाद भी अजायब राय ने पुत्र का नाम धनपत राय रखा। बचपन में ही माता-पिता का निधन हो गया था। तत्कालीन पारिवारिक, सामाजिक और राजनीतिक परिस्थितियों ने धनपत राय को कलम की ओर जाने को विवश किया।

प्रेमचन्द का पहला लिखा उपन्यास देवस्थान रहस्य

प्रेमचन्द का पहला लिखा उपन्यास ‘‘असरारे-मआबिद’’ उर्दू में था हिन्दी में इसका नाम ’देवस्थान रहस्य’ जों ‘आवाज ए-खल्क’ नामक उर्दू पत्रिका में 8 अक्टूबर 1903 से 1 फरवरी 1905 तक धारावाहिक रुप से असरारे-मआदिब नाम से प्रकााित हुआ। ‘‘हम खुरमां ओ हम सबाब’’ प्रेमचन्द के उपन्यास दो संस्करण प्रकाशित हुए। पहला संस्करण बाबू महादेव प्रसाद वर्मा ने प्रकााित किया, दूसरा संस्करण नवल किाोर प्रेस लखनउ से प्रकााित हुआ। किसी भी संस्करण में प्रकाान तिथि मुद्रित नहीं है। इसका हिंदी रुपांतर प्रेमा के नाम से र्वा 1907 में इंडियन प्रेस इलाहाबाद से प्रकााित हुआ था। उपन्यास का एक उर्पाीाक भी था ’दो सखियों का विवाह’। उपन्यास के मुख्य पृठ पर लेखक का नाम बाबू नबाब राय बनारसी अंकित था। इस उपन्यास के प्रथम संस्करण में एक हजार प्रतियां निकली थीं। मार्च 1930 में हंस का पहला अंक प्रकााित हुुआ। यह दोनों उपन्यास बाद में अमृत राय ने हंस प्रकाान इलाहाबाद से 1962 में मंगलाचरण नामक संकलन में संकलित कर प्रकााित करवाया।

जब प्रेमचन्‍द को ब्रिटिश सरकार का कोप भाजन बनना पड़ा

स्वाधीनता आन्दोलन का असर उनके लेखन पर पड़ा। परतंत्रता की बेड़ियों में जकड़े देश को देख, देशभक्त आन्दोलनकारियों के कारनामों को सुन, अंग्रेजों के दमन से प्रभावित, उनका पहला कहानी संग्रह ‘सोजे वतन’ सन् 1908 में प्रकाशित हुआ। जो देशभक्ति की भावना से भरी पॉंच उर्दू कहानियों का संकलन था। फलस्वरूप उन्हें अंग्रेजी सरकार का कोप भाजन बनना पड़ा और ‘सोजे वतन’ की सारी प्रतियां जब्त कर ली गई थी। 15 फरवरी 1927 को लखनउ पहुंचकर प्रेमचन्द ने बाबू विणु नारायण भार्गव से भेंट की और माधुरी कार्यालय में सह संपादक का पद ग्रहण किया। 1936 अर्थात मृत्यू से पहले उन्होंने हिन्दी साहित्य जगत को गोदान, गबन, कर्मभूमि, निर्मला, रंगभूमि जैसी प्रसिद्ध उपन्यास, कृतियां प्रदान कीं। यही नहीं पूस की रात, शतरंज के खिलाड़ी, नमक का दरोगा, दो बैलों की जोड़ी, ईदगाह जैसी अनेक प्रसिद्ध कहानियों ने प्रेमचन्द को उस शिखर पर पहुंचाया, जहां पहुंचना आज के कथाकारों के लिए संभव नजर नहीं आता।
विश्व कहानी साहित्य के इतिहास में या उपन्यासों के इतिहास में ग्रामीण जीवन का जिस तरह सजीव और यथार्थ चित्रण प्रेमचन्द ने किया, सत्य यह है कि वैसा अन्य कोई कथाकार, उपन्यासकार नहीं कर सका। मानवीय करूणा, दया, ममता, सहयोग, प्रेम, आस्था, सभी कुछ तो साकार हुआ था, प्रेमचन्द की रचनाओं में। हमारे तत्कालीन समाज के विभिन्न पात्र चाहे बचपन के हों, ग्रामीण परिवेश के हों या पारिवारिक जीवन की निर्धनता व गरीबी के भोगे कटु अनुभवों को प्रेमचन्द ने अपनी कहानियों का आधार बनाया। आर्थिक तंगी, गरीबी, सामाजिक दुर्दशा, छुआछूत, भेदभाव, उंची जाति के अहंकार, सवर्णों के अत्याचार, को जिस तरह सजीव कर रचनाओं में दर्शाया गया उनके द्वारा, उसी का परिणाम है कि उनकी कहानियां, उपन्यास आम जनजीवन की कहानियां बनकर विश्व की प्रसिद्ध कहानियों की श्रेणी में अपना स्थान बना पायीं।

प्रेमचन्द का साहित्यिक जीवन उनके साहित्य में है

उनकी सादगी पर प्रेमचन्द के पुत्र अमृतराय उनके बारे में लिखते हैं- ‘मुझे याद नहीं है कि मैंने उनके पैरों में कभी चप्पल या पंप जूता देखा हो, सदा वही फीते वीते से लेश शू, सादगी के साथ धोती-कुर्ते पर पहनते थे। वह ठठा कर बड़ी देर तक हंसते कि कपड़ा तन ढांपने के लिए ही नहीं, अच्छा दिखने के लिए भी पहना जाता है।’ हरिगन्धा के संपादक ने, एक जगह प्रेमचन्द के बारे में लिखा है- उनके जीवन में लिखना, लिखते रहना एक सनक थी। जब लिखते तब अपना बदन, अपना परिवेश, घर-बार, गृहस्थी, समस्याएं, दायित्व, सम्पदा सब कुछ भूल जाया करते थे। मानों तप में लीन हों। उन्हें मान्यता, प्रशंसा, अच्छी समीक्षा, जयजयकार, किसी की भी आवश्यकता कतई महसूस नहीं होती थी। प्रेमचन्द का साहित्यिक जीवन उनके साहित्य में है। उनके घर का जीवन किसी भी दृष्टि से साहित्यिक का जीवन नहीं था, क्योंकि वह किसी भी मध्यवर्गीय गृहस्थ जीवन से, किसी दृष्टि से भिन्न नहीं था। आज की कहानियों में ही क्या, समाज पर भी दृष्टि डालें तो नमक का दरोगा कहीं नजर नहीं आता। मगर नमक के दरोगा जैसे लोगों की जरूरत इस समाज को हमेशा रहेगी और प्रेमचन्द की कहानी से निकलकर अप्रत्यक्ष रूप से वह हमारे समाज में निरंतर दस्तक देता रहेगा।
कितना सरल, आम जनजीवन, पारिवारिक तथा ग्रामीण परिवेश से जुड़ा उनका लेखन था, यह इसी बात से पता चलता है कि धनपत राय वर्षों बाद एक बार अपने प्रसिद्ध साहित्यकार मित्र के साथ जब अपने गांव पहुंचे तो उन्हें पहचानने वाले वहां नहीं के बराबर थे। जून की तपती दोपहरी में पीपल के पेड़ के नीचे बने चबूतरे पर बैठकर सुस्ताने लगे थे कि तभी गांव की कुंजड़नी जो बहुत बूढ़ी हो चुकी थी, वहां से गुजरी तो धनपत को नहीं पहचान पाई, मगर धनपत राय ने उसे पहचान कर आवाज दे कर जब पुराने नाम से पुकारा तो कुंजड़नी अपना नाम सुनकर चौंक पड़ी। वर्षों बाद किसी ने उसे इस तरह पुकारा था। कुंजड़नी को जब धनपत ने अपना और पिता का नाम याद दिलाया तो उसकी आंखें भीग उठी थीं। धनपत ने बड़ी आत्मीयता से जब उसका, गांव का, गांव के लोगों का हालचाल पूछा तो वह फूटफूटकर रो पड़ी। सिसकियां हिचकियां लेते वह गांव के बारे में, ठाकुर के, साहुकार के बारे में, पंडित के बारे में, छन्नों के बारे में गणेशी के बारे में बताती जाती और अपनी फटी, मैली धोती के आंचल से ऑसू पोंछती जाती थी। वह बता रही थी, कि गांव में उसे अब कोई खाना नहीं देता, कोई उसे काम नहीं देता, पगली आयी, पगली आयी कहकर बच्चे पत्थर मारते हैं, उसकी धोती खींचते हैं, सारा गांव खड़ा होकर हंसता है, तमाशा देखता है, कोई अपने बच्चों को डांटता डपटता नहीं। वह लगातार बोलती जा रही थी कि धनपत के साहित्यकार मित्र बोल पड़े, ‘धनपत तुम्हारे गांव को देखकर मेरे दिमाग में एक अच्छी कहानी का प्लाट घूम रहा है…।’

कथा साहित्य का सम्राट और उपन्यास सम्राट जैसे अलंकरण से पुकारे गए प्रेमचन्द

धनपत राय ने उन्हें टोकते हुए कहा, ‘ठहरो जरा, जो कहानी मैं इस समय कुंजड़नी की आंखों से और अपने कानोें से सुन रहा हूँ उस कहानी से सुंदर तुम्हारी कहानी का प्लाट नहीं हो सकता, मुझे जरा सुनने दो।’, इस तरह केे कहानीकार, उपन्यासकार थे प्रेमचन्द। भाषा शैली इतनी सरल कि हर कोई कहानी के भाव तथा मर्म को आसानी से समझ ले। शायद इसी कारण प्रेमचन्द को कथा साहित्य का सम्राट और उपन्यास सम्राट जैसे अलंकरण से पुकारा गया। जब उन्हें उपन्यास सम्राट, कथा सम्राट या कलम का सिपाही कहा गया तब उन्होंने बड़े सरल शब्दों में कहा- ‘मैं तो कलम का मजदूर हूँ।’
वह कहते थे, साहित्य के बिना जीवन रीता है, खाली खाली है। साहित्य को जन साहित्य के रूप में प्रतिष्ठित करना नितान्त आवश्यक है। यह उन्होंने तब कहा था जब हमारे देश में साहित्य का स्वर्ण युग था। सैकड़ों कालजयी रचनाओं ने, कृतियों ने जन्म लिया था। आज के साहित्यकार अपने को प्रतिष्ठित करने की होड़ में हैं न कि साहित्य को। यही सबसे बड़ा दुर्भाग्य है।
प्रेमचन्द को साहित्य के शिखर तक पहूंचने के लिए किसी सरकार, संस्था, सत्ता, मंच, पत्रकार या व्यक्ति का सहारा नहीं लेना पड़ा। उनकी कहानियों ने, उनके उपन्यासों ने, उनकी सरल भाषाशैली ने उन्हें इस शिखर तक पहुंचाया जहां कि आज कोई कल्पना भी नहीं कर सकता। सभ्यता, समाज, विकास, समृद्धि की हम भले ही कितनी सीढ़ियां क्यूँ न चढ़ जायें, दूरदर्शन के चैनलों का भूत सब कुछ भुला कर हमें, हिप्नोटाइज क्यूं न कर दें मगर उनकी कहानियां हमारे साहित्य जगत में सदैव जीवित रह कर दिशा निर्देश देती रहेंगी।
यह कटु सत्य है उस समय के साहित्य में, रचनाधर्मिता में और आज के साहित्य में रचनाधर्मिता में जमीन आसमान का फर्क दृष्टि गोचर होता है। तब पुस्तक पढ़ने का बहुत मन करता था और जब तक पुस्तक समाप्त नहीं हो जाती थी तब तक पढ़ते रहते थे। अब पुस्तक पढ़ने का मन भी नहीं के बराबर होता है और पहले की अपेक्षा पुस्तकें बहुत अधिक प्रकाशित हो रही हैं, क्योंकि वह पाठक पर अपना असर नहीं डाल पा रही हैं। बिल्कुल वैसे ही जैसे किसी समय ब्लैक एंड व्हाइट फिल्में जब आती थी तो मन को दिल को स्पर्श कर जाती थीं। वह संगीत वह गीत बहुत कर्णप्रिय और लुभावने होते थे और लोग उन्हें वर्षों तक गुनगुनाते रहते थे। दूसरी तरफ आज की फिल्मों का शोर शराबा तो जमकर होता है लेकिन वह संवेदनाओं को स्पर्श नहीं कर पातीं है भले ही उनका विज्ञापन, प्रचार प्रसार कितना ही क्यों न हो। फिल्मों से करोड़ों की आय हुई का राग भले ही कितना अलापे कोई। पर फिल्में अपना व्यापक अक्सर दर्शकों पर नहीं छोड़ पाती हैं।
प्रेमचन्द कहानी के बारे में अपने वक्तव्यों में कोई भूमिका बना कर अपने को महान कहानीकार साबित करने का प्रयत्न नहीं करते हैं, जैसे कि आज के मठाधीश करते हैं। वह बड़े मासूम शब्दों में कहते हैं। ‘कभी कभी सुनी सुनाई घटनाएं ऐसी होती हैं कि उन पर आसानी से कहानी की नींव रखी जा सकती है। कोई घटना, महज सुुंदर, चुस्त शब्दावली और शैली का चमत्कार दिखाकर ही कहानी नहीं बन जाती।’ वह कहानी में मनोवैज्ञानिक क्लाइमैक्स को आवश्यक समझते हैं, कहते भी थे कि ‘जहां मुझे आवश्यक लगता है कि साहित्यिक और काव्यात्मक रंग कहानी में उत्पन्न किया जा सकता है, तो मैं ऐसे अवसर का लाभ उठाता हूं। कविता कहानी ही नहीं, साहित्य के प्रत्येक विषय के लिए कुछ प्राकृतिक लगाव आवश्यक है। प्रकृति अपने आप कहानी का प्लाट बनाती है। नाटकीय रंग पैदा करती है, ओज लाती है, साहित्यिक गुण जुटाती है और अनजाने आप ही आप सब कुछ होता रहता है।’ यह बात इतने सरल और खुले शब्दों में उन्होंने कही जो आज का कोई कहानीकार न कह सका, न कर सका। 8 अक्टूबर 1936 को इस कालजयी रचनाकार का देहान्त हुआ।
यह वह देश है, जहां लोग देवताओं पर भी कीचड़ उछालने से नहीं चूकते। फिर प्रेमचन्द भले ही दुनिया में पूजे जायें, यहां तो उन पर उंगलियां उठनी ही थी, पहले तो उनकी एक कृति को पाठ्यक्रम से हटाने का प्रयास हुआ। फिर उनकी एक कृति में कुछ शब्दों पर आपत्ति उठायी गयी, पर कटु सत्य है कि भले ही बड़े बडे़ सम्मान उपाधियां लोगों को मिली हों, पर पिछले 144 वर्षों में कोई दूसरा प्रेमचन्द पैदा नहीं हुआ और शायद न होगा। किसान जीवन, पूंजीवाद, सामंती प्रथा, दलित जीवन, नारी शोषण, हिन्दू मुस्लिम एकता, किस विषय को नहीं छुआ प्रेमचन्द की कलम ने। यही बात उन्हें विश्व के महानतम लेखकों में स्थान दिलाती है।