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श्राद्ध और पितृपक्ष का वैज्ञानिक महत्व

लेखक – डॉ. ओउम् प्रकाश पाण्डेय

पितर का अर्थ होता है पालन या रक्षण करने वाला। पितर शब्द “पा रक्षणे” धातु से बना है। इसका अर्थ होता है पालन और रक्षण करने वाला। एकवचन में इसका प्रयोग करने से इसका अर्थ जन्म देने वाला पिता होता है और बहुवचन में प्रयोग करने से पितर यानी सभी पूर्वज होता है। इसलिए पितर पक्ष का अर्थ यही है कि हम सभी सातों पितरों का स्मरण करें। इसलिए इसमें सात पिंडों की व्यवस्था की जाती है, जिन्हें सप्तपिंडीं या सपिंडीं कहा जाता है। इन पिंडों को बाद में मिला दिया जाता है। ये पिंड भी पितरों की वृद्धावस्था के अनुसार क्रमश: घटते आकार में बनाए जाते थे। लेकिन आज इस पर ध्यान नहीं दिया जाता।

राष्‍ट्रोक्ति वेब डेस्‍क : श्राद्ध कर्म श्रद्धा का विषय है। यह पितरों के प्रति हमारी श्रद्धा प्रकट करने का माध्यम है। श्राद्ध आत्मा के गमन जिसे संस्कृत में “प्रयन्ति” कहते हैं, से जुड़ा हुआ है। प्रयन्ति ही अपभ्रंश में “प्रेति” और बाद के बोलचाल की भाषा में “प्रेत” बन गया। यह कोई भूत-प्रेत वाली बात नहीं है। शरीर में आत्मा के अतिरिक्त मन और प्राण भी हैं। आत्मा तो सर्वव्यापक है, उसे छोड़ दें तो शरीर से जब मन को निकलना होता है, तो मन प्राण के साथ ही निकलता है। प्राण मन को लेकर निकलता है। प्राण जब निकल जाता है तो जिस शरीर में वर्षो रहा है उसके प्रति उसका स्वभाविक मोह बना रहता है। इसके कारण वह शरीर के इर्द-गिर्द ही घूमता है, कहीं जाता नहीं। शरीर को जब नष्ट किया जाता है, उस समय प्राण मन को लेकर चलता है।

मन कहाँ से आता है? और प्राण उसको लेकर कहाँ जाता है। इस विषय में भारतीय अवधारणा में बहुत सूक्ष्म विवेचन व वैज्ञानिक परिक्षण किया गया है। चंद्रमा वनस्पति का भी कारक है। रात को चंद्रमा के कारण वनस्पतियों की वृद्धि अधिक होती है। इसलिए रात को ही पौधे अधिक बढ़ते हैं। दिन में वे सूर्य से प्रकाश संश्लेषण के द्वारा भोजन लेते हैं और रात चंद्रमा की किरणों से बढ़ते हैं। वह अन्न जब हम ग्रहण करते हैं, तो मुख में चबाते समय लार के संसर्ग से सर्वप्रथम उसका रुपान्तरण रस के रुप में होता है। यही रस पाचनक्रिया से गुजरने के पश्चात रक्त में रुपान्तरित हो जाता है। इस रक्त से मांस, मांस से मेद, मेद से मज्जा और मज्जा के बाद अस्थि बनती है। अस्थि के बाद वीर्य बनता है। ब्रह्मचर्य द्वारा वीर्य के संचयन से ओज (मुखमण्डल का ओज) निखरता है। इस ओज के अनुरुप मन का स्वरुप बनता है।

इसलिए कहा भी गया है कि जैसा खाओगे अन्न, वैसा ही बनेगा मन। इस प्रकार हम देखते हैं कि चंद्रमा ही मन का श्रोत है। शास्त्रों में स्पष्ट उल्लेखित है कि “चंद्रमा मनसो जातः “ यानी मन की उत्पत्ति चन्द्रमा से ही है या फिर चन्द्रमा ही मन का कारक है। इसलिए जब मन खराब होता है या फिर उससे मानसिक असुंतलन होती है तो उस रोग को अंग्रेजी में ल्यूनैटिक कहते हैं। अंग्रेजी में “लूनार” का अर्थ चंद्रमा होता है और इससे ही ल्यूनैटिक शब्द बना है। मन का जुड़ाव चंद्रमा से है, इसका एक प्रमाण यह भी है कि हृदयाघात जैसी समस्याएं पूर्णिमा के दिन अधिक होती पायी गई हैं।

इसी आधार पर यह निरुपित किया गया कि मन जब शरीर से मुक्त होकर प्राण के सहयोग से गमन करेगा तो उसकी यात्रा अपने स्रोत अर्थात चंद्रमा तक की होगी। इस आधार पर दाह संस्कार के समय चंद्रमा जिस नक्षत्र में होगा, मन उसी दिशा की ओर आकर्षित होगा व मन की इच्छा अनुरुप प्राण, मन को उसी गन्तव्य की ओर ले कर जाएगा। चूंकि 27 दिनों के अपने चक्र में चंद्रमा 27 नक्षत्र में घूमता है, इसलिए चंद्रमा घूम कर अठ्ठाइसवें दिन फिर से उसी नक्षत्र में आ जाता है।

अतः मन की यह 28 दिन की यात्राचक्र चन्द्र मास के अनुसार तेरह महीनों, जो कि सौर मास के बारह महिनों के बराबर होती है, प्राण मन को श्येन पक्षी की गति से चंद्रमा तक पहुँचता है। चंद्रमा में पहुँचते ही मन का चन्द्रमा में विलयन हो जाता है। शतपथ ब्राह्मण में इस क्रिया के आधार पर ही कहा गया है कि “चंद्रमा मनस: लीयते”। इसी तेरह महिनें की यात्रा के प्रतीक स्वरूप लोक में हम दिवगंत का तेरहवीं समारोह करते हैं। अब इस तेरह महिनों की लम्बी यात्रा तक मन की ऊर्जा को बनाए रखने के लिए प्रत्येक 28 दिनों पर नैमित्तिक श्राद्ध करनें की मासिक व्यवस्था का निर्देशन गृह सूत्रों में किया गयाव है।

चंद्रमा सोम का कारक है। इसलिए उसे सोम भी कहा जाता हैं। सोम सबसे अधिक बली या बल प्रदाता है। वेद में उल्लेखित है कि आदित्य भी सोम से बलवान होते हैं ( सोमेन आदित्यः बलिनः)। चावल में सोम की मात्रा अधिक होती है। धान हमेशा पानी में ही डूबा रहता है। सोम तरल होता है। इसलिए चावल के आटे का पिंड बनाते हैं। तिल ( अग्नि तत्व) और जौ (सोम तत्व) भी इसमें मिलाते हैं। इसमें जल (सोम तत्व) व घृत (अग्नि तत्व) भी मिलाते हैं, जिससे बल व उर्जा का अनुपात सम बना रहे।अब इस पिण्ड को दाहिने हथेली में अंगूठे और तर्जनी के मध्य में नीचे का उभरा हुए स्थान पर कुश के उपर रखा जाता है। तर्जनी व अंगूठे के मध्य का वह निचला स्थान “शुक्र ग्रह” का माना गया है। पिता के शुक्र से ही हमारा जन्म होता हैं और इसलिए उस स्थान पर कुश के उपर पिण्ड रखा जाता है क्योंकि कुश ऊर्जा का कुचालक होता है, अतः वह पिण्ड में निहित सोम व उर्जा तत्व को श्राद्धकर्ता के शुक्र से संसर्ग को बाधित कर देगा। श्राद्ध करने वाला इस कुश पर रखे पिंड को लेकर सूंघता है। चूंकि वह अपने पितर का जैविक अंश है, इसलिए वह उसे श्रद्धाभाव आकाश की ओर पितरों के गमन की दिशा में उन्हें मानसिक रूप से स्मरण कर उन्हें समर्पित करता है और पिंड को जमीन पर गिरा देता है। इससे पितर उसके सार को मानसिक रुप से ग्रहण कर फिर से ऊर्जावान हो 28 दिनों की अगामी यात्रा करते हैं। इसलिए शास्त्रों में पितरो को अपने गन्तव्य तक पहुँचने के लिए उनके यात्राचक्र हर विन्दु अर्थात प्रति 28वें दिन पिंडदान की व्यवस्था सुनिश्चित की गई है।

पिंडदान कराते समय पंडित लोग केवल तीन ही पितरों को याद करवाते हैं। वास्तव में सात पितरों को स्मरण करना चाहिए। हर चीज सात हैं। सात ही रस हैं, सात ही धातुएं हैं, सूर्य की किरणें भी सात हैं। इसीलिए सात जन्मों की बात कही गई है। पितर भी सात हैं और इनकी अंशात्मक सहो मात्रा 84 होती हैं। यह कैसे, इसे समझें। व्यक्ति, उसका पिता, पितामह, प्रपितामह, वृद्ध पितामह, अतिवृद्ध पितामह और सबसे बड़े वृद्धातिवृद्ध पितामह, ये सात पीढियां होती हैं। इनमें से वृद्धातिवृद्ध पितामह का एक अंश, अतिवृद्ध पितामह का तीन अंश, वृद्ध पितामह का छह अंश, प्रपितामह का दस अंश, पितामह का पंद्रह अंश और पिता का इक्कीस अंश व्यक्ति को मिलता है। इसमें उसका स्वयं का अर्जित 28 अंश मिला दिया जाए तो 84 सहो मात्रा हो जाती है। जैसे ही हमें पुत्र होता है, वृद्धातिवृद्ध पितामह का एक अंश उसे चला जाता है और उनकी मुक्ति हो जाती है। इससे अतिवृद्ध पितामह अब वृद्धातिवृद्ध पितामह हो जाएगा। पुत्र के पैदा होते ही सातवें पीढ़ी का एक व्यक्ति मुक्त हो गया। इसीलिए सात पीढिय़ों के संबंधों की बात होती है।

हम पितृपक्ष क्यों मनाते हैं ?

अब यह समझें कि 15 दिनों का पितृपक्ष हम क्यों मनाते हैं। यह तो हमने जान लिया है कि पितरों का संबंध चंद्रमा से है। चंद्रमा की पृथिवी से दूरी 3,84,400 कि.मी. की दूरी पर है। हम जिस समय पितृपक्ष मनाते हैं, यानी कि आश्विन महीने के पितृपक्ष में, उस समय पंद्रह दिनों तक चंद्रमा पृथिवी के सर्वाधिक निकट यानी कि लगभग 84,300 कि.मी. नजदीक आ जाता है। उसका परिक्रमापथ ही ऐसा है कि वह इस समय पृथिवी के सर्वाधिक निकट होता है। इसलिए कहा जाता है कि पितर हमारे निकट आ जाते हैं। शतपथ ब्राह्मण में कहा है “विभु: उर्ध्वभागे पितरो वसन्ति” यानी विभु अर्थात् चंद्रमा के दूसरे हिस्से में पितरों का निवास है। चंद्रमा का एक पक्ष हमारे सामने होता है जिसे हम देखते हैं। परंतु चंद्रमा का दूसरा पक्ष हम कभी देख नहीं पाते। इस समय चंद्रमा दक्षिण दिशा में होता है। दक्षिण दिशा को यम का घर माना गया है।

आज हम यदि आकाश को देखें तो दक्षिण दिशा में दो बड़े सूर्य हैं जिनसे विकिरण निकलता रहता है। हमारे ऋषियों ने उसे श्वान प्राण से चिह्नित किया है। शास्त्रों में इनका उल्लेख लघु श्वान और वृहद श्वान के नाम से हैं। इसे आधुनिक विज्ञान “केनिस माइनर” और “केनिस मेजर” के नाम से चिन्हित करता है। इसका उल्लेख अथर्ववेद में भी आता है। वहाँ कहा है “श्यामश्च त्वा न सबलश्च प्रेषितौ यमश्च यौ पथिरक्षु श्वान”। अथर्ववेद 8/1/19 के इस मंत्र में इन्हीं दोनों सूर्यों की चर्चा की गई है। श्राद्ध में हम एक प्रकार से उसके प्रतिकात्मक श्वान अर्थात कुत्ते को हवि देते हैं कि पितरों को उनके विकिरणों से कष्ट न हो। पितर पश्चिम व दक्षिण दिशा की ओर गमन करते हैं और शनि पश्चिम दिशा का अधिष्ठाता है व शनि का वाहन काग है। अतः उसके प्रतिकात्मक कागबली भी दी जाती है।

अब इस नैमित्तिक श्राद्ध के अतिरिक्त दो और श्राद्ध का उल्लेख शास्त्रों में किया गया है। जिसे “आयनिक” व “सांवत्सरिक” श्राद्ध कहते हैं। आयनिक श्राद्ध दोनों अयनों – उत्तरायण व दक्षिणायन से संबंधित है, जबकि वार्षिक श्राद्ध को सांवत्सरिक कहा जाता है। इस प्रकार शास्त्रोचित मासिक (13), आयनिक (2) व वार्षिक (1) मिला कर अंत्येष्टि उपरान्त कुल 16 श्राद्ध कर्म का सम्पादन कर हम दिवगंत आत्मा के प्रति अपनी भावभीनी श्रद्धाञ्जलि अर्पित करते हैं। परन्तु आजकल लोग अपनी सुविधानुसार इनके पालन में व्यतिक्रम कर निहित विधियों की अवहेलना करते हुए षोडस श्राद्ध को सोलहवे दिन सम्पन्न कर इतिश्री कर लेता है। हमें यह ध्यान देना चाहिए कि श्रद्धा भाव में शास्त्रोचित कर्तव्यों में की गई कोई त्रुटि से न तो हमें वांछित काम्य सुख व सिद्धि की प्राप्ति हो पाएगी और नही दिवगंत आत्मा को परम गति ही मिल पाएगी और न तो हम सूतक के पाप से भी बच पाएंगे।

इस प्रकार से देखा जाए तो पितृपक्ष और श्राद्ध में हम न केवल अपने पितरों का श्रद्धापूर्वक स्मरण कर रहे हैं, बल्कि पूरा खगोलशास्त्र को भी समझ ले रहे हैं। श्रद्धा और विज्ञान का यह एक अद्भुत मेल है, जो हमारे ऋषियों द्वारा बनाया गया है। आज समाज के कई वर्ग श्राद्ध के इस वैज्ञानिक पक्ष को न जानने के कारण इसे ठीक से नहीं करते। कुछ लोग तीन दिन में और कुछ लोग चार दिन या सोलह दिन में ही सारी प्रक्रियाएं पूरी कर डालते हैं। यह न केवल अशास्त्रीय है, बल्कि हमारे पितरों के लिए अपमानजनक भी है। जिन पितरों के कारण हमारा अस्तित्व है, उनके निर्विघ्न परलोक यात्रा की हम व्यवस्था न करें, यह हमारी कृतघ्नता ही कहलाएगी।

पितर का अर्थ होता है पालन या रक्षण करने वाला। पितर शब्द “पा रक्षणे” धातु से बना है। इसका अर्थ होता है पालन और रक्षण करने वाला। एकवचन में इसका प्रयोग करने से इसका अर्थ जन्म देने वाला पिता होता है और बहुवचन में प्रयोग करने से पितर यानी सभी पूर्वज होता है। इसलिए पितर पक्ष का अर्थ यही है कि हम सभी सातों पितरों का स्मरण करें। इसलिए इसमें सात पिंडों की व्यवस्था की जाती है, जिन्हें सप्तपिंडीं या सपिंडीं कहा जाता है। इन पिंडों को बाद में मिला दिया जाता है। ये पिंड भी पितरों की वृद्धावस्था के अनुसार क्रमश: घटते आकार में बनाए जाते थे। लेकिन आज इस पर ध्यान नहीं दिया जाता।

(वार्ताधारित) ✍🏻साभार – भारतीय धरोहर