
विपिन थपलियाल
दिसम्बर 1934 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा वर्धा में आयोजित संघ का शीत शिविर… गाँधीजी के आगमन के कारण काफी चर्चा का विषय बन गया था ! डॉक्टर केशव बलिराम हेडगेवार जी के सान्निध्य में रहते हुए संघ कार्य के लिए अपना जीवन खपाने वाले नारायण हरि पालकर ने 1960 में प्रकाशित अपनी पुस्तक “डॉक्टर हेडगेवार चरित” में महात्मा गाँधी और डॉक्टर हेडगेवार के बीच वर्धा में हुईं इस ऐतिहासिक भेंट का वर्णन किया है…
नारायण हरि पालकर की पुस्तक के अनुसार, 1934 में वर्धा में आयोजित शीत शिविर के निकट ही सेवाग्राम आश्रम में गांधीजी पधारे… शिविर में चल रही गतिविधियों को देखकर उनके मन में उत्सुकता हुई। यहाँ कौन सा कार्यक्रम या परिषद का सम्मेलन होने वाला है? उन्होने संबंधित कार्यकर्ताओं से चर्चा करके शिविर देखने का निश्चय किया।
22 दिसंबर 1934 को शिविर का उद्घाटन हुआ था। 25 दिसंबर, 1934 को वर्धा सेवाग्राम आश्रम के आश्रमवासियों के साथ गांधीजी संघ के शिविर में पधारे। शिविर में गणवेशधारी स्वयंसेवक, शिविर के कार्यक्रम, अनुशासन देखने के बाद महात्मा गांधी ने कहा, मैं बहुत प्रसन्न हूँ, संपूर्ण देश में इतना प्रभावी संगठन मैंने अभी तक नहीं देखा। जब उन्हें मालूम चला कि संघ के शिविर में किसान-मजदूर सभी हैं… सभी जातियों के लोग साथ मिलकर रहते, साथ भोजन करते हैं। पूछने पर किसी ने गांधी जी से कहा संघ में हमें पता भी नहीं चलता तथा हमारी यह जानने की इच्छा भी नहीं होती कि कौन किस जाति का है। हम सब हिंदू हैं यह भाव सदैव रहता है।
वर्धा शिविर के दर्शन के बाद गांधी जी ने डॉक्टर हेडगेवार जी से मिलने की इच्छा जताई। अगले दिन, 26 दिसंबर को वर्धा आश्रम में गांधीजी की डॉक्टरजी से भेंट हुई…आधे घंटे की मुलाकात में संघ की कार्यपद्धति, देश की वर्तमान परिस्थितियों सहित विभिन्न विषयों पर चर्चा हुई।
गांधीजी के साथ डॉ. हेडगेवार जी का संवाद
महात्मा गाँधी ने डॉक्टर हेडगेवार से कहा, आपके शिविर में संख्या, अनुशासन, स्वयंसेवकों की वृत्ति और स्वच्छता आदि बातों को देखकर बहुत संतोष हुआ। आपका संगठन बहुत अच्छा है, मुझे पता चला है कि आप बहुत दिनों तक कांग्रेस में काम करते थे फिर कांग्रेस जैसी लोकप्रिय संस्था के अंदर इस प्रकार का स्वयंसेवी संगठन क्यों नहीं चलाया? बिना कारण ही अलग संगठन क्यों बनाया?
डॉ. हेडगेवार ने उत्तर देते हुए कहा, मैंने पहले कांग्रेस में ही यह कार्य प्रारंभ किया था, 1920 की नागपुर कांग्रेस में मैं स्वयंसेवक विभाग का संचालक था परंतु सफलता नहीं मिली, तब यह स्वतंत्र किया है।
गाँधीजी, कांग्रेस में आपके प्रयत्न सफल क्यों नहीं हुए? क्या पर्याप्त आर्थिक सहायता नहीं मिली?
डॉ. हेडगेवार, नहीं पैसे की कोई बात नहीं थी, पैसे से अनेक बातें सफल हो सकती हैं किंतु पैसे के भरोसे ही संसार में सभी योजना सफल नहीं हो सकती । यहां प्रश्न पैसे का नहीं अंतःकरण का है।
गांधीजी ने प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा, आपका यह कहना है उद्दात्त चरित्र के व्यक्ति कांग्रेस में नहीं थे?
डॉक्टर हेडगेवार ने कहा, मेरे कहने का यह तात्पर्य नहीं है, कांग्रेस में अनेक अच्छे व्यक्ति हैं परंतु सवाल मनोवृति का है, काँग्रेस की स्थापना एक राजनीतिक कार्य को सफल करने की दृष्टि से हुई है।
गाँधीजी, फिर स्वयंसेवक के बारे में आपकी क्या कल्पना है?
डॉक्टर जी, देश की सर्वांगीण उन्नति के लिए प्राथमिकता से अपना सर्वस्व अर्पण करने के लिए तत्पर शुद्ध नेता को हम अपना स्वयंसेवक समझते हैं तथा संघ का लक्ष्य इसी प्रकार के स्वयंसेवक का निर्माण करना है ।
गाँधीजी – इतने बड़े संघटन का खर्च कैसे चलता है ?
डॉक्टर जी – अपनी जेब से अधिकाधिक पैसे गुरुदक्षिणा-रूप में अर्पण कर स्वयंसेवक ही यह भार वहन करते हैं
गाँधीजी – निश्चित ही विलक्षण है ! क्या आप किसी से धन नहीं लेंगे ?
डॉक्टरजी – जब समाज को अपने विकास के लिए यह कार्य आवश्यक प्रतीत होगा तब हम अवश्य आर्थिक सहायता स्वीकार करेंगे
गाँधीजी – आपको इस कार्य के लिए अपना सम्पूर्ण समय खर्च करना पड़ता होगा। फिर आपके कुटुम्ब का निर्वाह कैसे होता है?
डॉक्टरजी – डॉक्टरजीः मैंने विवाह नहीं किया
यह उत्तर सुनकर गाँधीजी स्तम्भित हो गए, और फिर बोले –
‘‘अच्छा आपने विवाह नहीं किया ? बहुत बढ़िया। इसी कारण इतनी थोड़ी अवधि में आपको इतनी सफलता मिली है।’’
इस पर डॉक्टरजी यह कहते हुए कि ‘‘मैंने आपका बहुत समय लिया, आपका आशीर्वाद रहा तो सब मनमाफिक होगा।
अब आज्ञा दीजिए,’’ चलने के लिए उठे। गांधीजी उन्हें द्वार तक पहुँचाने आए और विदा लेते हुए बोले ‘‘डॉक्टरजी, अपने चरित्र तथा कार्य पर अटल निष्ठा के बल पर आप अंगीकृत कार्य में निश्चित सफल होंगे।’’
