राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) द्वारा विज्ञान भवन, दिल्ली में आयोजित तीन दिवसीय व्याख्यानमाला “100 वर्ष की संघ यात्रा : नए क्षितिज” के तृतीय एवं अंतिम दिवस पर “जिज्ञासा समाधान” कार्यक्रम संपन्न
नई दिल्ली, 27 अगस्त। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में विज्ञान भवन, दिल्ली में आयोजित तीन दिवसीय व्याख्यानमाला “100 वर्ष की संघ यात्रा : नए क्षितिज” का मंगलवार को समापन हुआ। अंतिम दिन “जिज्ञासा समाधान” कार्यक्रम में सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने विभिन्न प्रश्नों का उत्तर देते हुए शिक्षा, संस्कृति, तकनीक, परंपरा और भारतीय ज्ञान परंपरा पर अपने विचार रखे।
कार्यक्रम का संचालन दिल्ली प्रांत कार्यवाह अनिल गुप्ता ने किया। उन्होंने बताया कि इस संवाद के लिए संघ को कुल 218 जिज्ञासाएँ प्राप्त हुईं, जिन्हें विषयवार 21 समूहों में विभाजित किया गया है। इसके अतिरिक्त लगभग 148 सुझाव और फीडबैक भी प्राप्त हुए।
तकनीक और आधुनिकता पर दृष्टिकोण
डॉ. मोहन भागवत जी ने कहा कि तकनीक और आधुनिकता का शिक्षा से कोई विरोध नहीं है। जैसे-जैसे मानव ज्ञान बढ़ता है, नई तकनीक सामने आती है और इसका उद्देश्य मनुष्य का भला करना होता है। किंतु उन्होंने चेतावनी दी कि तकनीक पर नियंत्रण मनुष्य के हाथ में रहना चाहिए, अन्यथा वही तकनीक मनुष्य की मालिक बन जाती है।
उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा “पहले मोबाइल को हम सुनते थे, अब मोबाइल हमें सुनाने लगा है।” उनका मानना है कि तकनीक का उपयोग समाज के हित में हो और उसके दुष्परिणामों से बचने के लिए संस्कारित शिक्षा आवश्यक है।

केवल साक्षरता नहीं, संस्कारयुक्त शिक्षा जरूरी
सरसंघचालक जी ने कहा कि शिक्षा का उद्देश्य केवल जानकारी देना नहीं, बल्कि व्यक्ति को संस्कारित करना है ताकि वह विवेकशील बन सके। “वास्तविक शिक्षा के बल पर मनुष्य विष का भी औषधि के रूप में उपयोग खोज सकता है।” उन्होंने बताया कि भारत की परंपरागत शिक्षा पद्धति विदेशी आक्रांताओं के कारण समाप्त हो गई। अंग्रेज़ी शासन ने ऐसी शिक्षा प्रणाली लागू की जिसका उद्देश्य देशवासियों को अपने अधीन रखना था। स्वतंत्र भारत में शिक्षा का लक्ष्य शासन चलाना नहीं, बल्कि नागरिकों का सर्वांगीण विकास और आत्मगौरव का संवर्धन होना चाहिए।
नागपुर का अनुभव और प्रशासनिक ढांचे की विडंबना
डॉ. मोहन भागवत जी ने नागपुर में प्रचारक रहते हुए एक अनुभव साझा किया। एक केरल के आईपीएस अधिकारी ने उनसे शिकायत की थी कि नागपुर में गर्म मौसम के बावजूद सरकारी दफ्तरों में सूट और टाई अनिवार्य है, जबकि दक्षिण भारत में परंपरागत वेशभूषा मान्य है। इस उदाहरण के माध्यम से उन्होंने कहा कि प्रशासनिक ढांचे में उपनिवेशकालीन मानसिकता अब भी बनी हुई है, और इसमें सुधार आवश्यक है।

भाषा, साहित्य और सार्वभौमिक मूल्य
डॉ. मोहन भागवत ने कहा कि भाषा केवल अभिव्यक्ति का माध्यम है। अंग्रेजी साहित्य पढ़ना गलत नहीं, लेकिन भारतीय साहित्य और परंपरा की उपेक्षा करना गलत है। उन्होंने कहा “यदि हम Oliver Twist पढ़ें और प्रेमचंद को छोड़ दें, तो यह उचित नहीं है।”
उन्होंने जोर देकर कहा कि माता-पिता का सम्मान, बड़ों के प्रति नम्रता और अहंकार से दूर रहना सार्वभौमिक मूल्य (Universal Values) हैं, जिन्हें हर धर्म मानता है। शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य इन्हीं मूल्यों को आत्मसात करना है।
कला, संगीत और संस्कारों की भूमिका
कला और संगीत पर विचार रखते हुए डॉ. मोहन भागवत ने कहा कि शिक्षा केवल पाठ्यक्रम तक सीमित नहीं होनी चाहिए। हर व्यक्ति को किसी न किसी कला से जुड़ना चाहिए। उन्होंने कहा “संगीत और कला से रहित मनुष्य, बिना पूंछ-सींग वाले पशु समान है।”
हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि कला और संस्कारों को अनिवार्य विषय बनाना सही नहीं होगा। बेहतर यह है कि बच्चों में इनकी रुचि स्वाभाविक रूप से जागृत की जाए। अपने अनुभव साझा करते हुए उन्होंने बताया कि परिवार और विद्यालय दोनों जगह कला और संगीत का वातावरण होना चाहिए, तभी बच्चों में इसका स्वाभाविक आकर्षण उत्पन्न होगा।
वैदिक शिक्षा और संस्कृत का महत्व
डॉ. मोहन भागवत ने कहा कि वैदिक परंपरा की 64 कलाओं में से जो आज प्रासंगिक हैं, उन्हें शिक्षा का हिस्सा बनाया जाना चाहिए। उन्होंने फिनलैंड की शिक्षा पद्धति का उदाहरण देते हुए कहा कि वहाँ मातृभाषा में शिक्षा और शिक्षक-छात्र का गहरा संवाद, भारतीय गुरुकुल परंपरा से मिलता-जुलता है।
संस्कृत पर उन्होंने कहा कि भारत और अपनी परंपरा को समझने के लिए संस्कृत भाषा का ज्ञान अनिवार्य है। अनुवादों पर निर्भर रहने से मूल ज्ञान अधूरा रह जाता है। उन्होंने सुझाव दिया कि संस्कृत शिक्षा केवल विद्यालयों तक सीमित न हो, बल्कि घर-घर में उसका वातावरण बने।
उन्होंने बताया कि संस्कृत में रोचक श्लोक और प्रश्नोत्तरी शैली बच्चों को स्वाभाविक रूप से आकर्षित करती है। इसलिए यदि संस्कृत को रोचक तरीके से पढ़ाया जाए, तो बच्चे इसे सहज ही सीख सकते हैं।

भारतीय ज्ञान परंपरा और संघ की भूमिका
आज शिक्षा सम्मेलनों और विश्वविद्यालयों में भारतीय ज्ञान परंपरा पर चर्चा होना सामान्य हो गया है। पहले तो यह शब्द बोलना भी कठिन था, इसे एक प्रकार का वर्जित (taboo) विषय माना जाता था। परंतु अब नई शिक्षा नीति में भी इसे स्थान मिला है।
संघ और शिक्षा क्षेत्र से जुड़े संगठन इस दिशा में कार्यरत हैं। आगे भी इस प्रयास को और गति दी जाएगी। उद्देश्य यही है कि भारत की ज्ञान परंपरा चाहे वह अध्यात्म हो या विज्ञान सबको समझाई और अपनाई जाए।
